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शाहजहा के शासनकाल पर आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया गया।

अलीगढ़ मुसिलम विश्वविधालय के सेंटर आफ एडवांस्ड स्टडी, इतिहास विभाग द्वारा मुगल शासक शाहजहा के शासनकाल पर आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार को संबोधित करते हुए विएना विश्वविधालय आसिट्रया की प्रोफेसर इब्बा कोच ने कहा कि इतिहासकारों ने शाहजहा शासनकाल का सबसे कम अध्ययन किया है। जबकि उनका अधिकतर ध्यान अकबर और औरंगजे़ब पर केनिद्रत रहा ।

उन्होंने कहा कि इसका कारण फारसी भाषा में शाहजहा के ऊपर लिखा गया वह साहित्य भी रहा जिसका अनुवाद कम होने के कारण शोधकर्ताओं ने उस पर वो कार्य नहीं किये जो उन्हें करना चाहिए था। प्रो. कोच ने कहा कि अकबर के मुकाबले में शाहजहा के बारे में पूर्वाग्रह के कारण उनके शासनकाल पर कार्य नहीं किया गया जबकि शाहजहा का दौर मुगल शासनकाल में इमारतों के निर्माण का दौर कहा जा सकता है। प्रो. कोच ने कहा कि शाहजहा के समय के इतिहास और कला को देखा जए तो वह मुगल शासन का उदय का समय था जो न तो इससे पहले देखा गया और न बाद में देखने को मिला।

इतिहास विभाग के अध्यक्ष और सैन्टर आफ एडवांस स्टडी इतिहास विभाग के कार्डीनेटर प्रोफेसर तारिक अहमद ने कहा कि शाहजहा के शासनकाल का सबसे अधिक महत्तव इसलिए है कि इस काल में न केवल ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण हुआ बलिक बड़े स्तर पर प्रशासनिक व संस्थागत बदलाव भी हुए। उन्होंने कहा कि यह सेमीनार न केवल शोधार्थियों बलिक पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों के लिए भी शाहजहा के शासनकाल को समझने में मददगार साबित होगा।

सेमीनार की कनवीनर डा. गुलफिशां खान ने कहा कि मुगलशासक शाहजहा का काल मुगल इतिहास का सबसे अधिक स्वर्णिम काल रहा है। इस काल में न केवल सिथरता रही बलिक उनका निर्माण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य हुआ जिस पर सभी इतिहासकार एकमत हैं। उन्होंने कहा कि यह विभाग इस संस्था के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की विरासत को आगे बढ़ा रहा है। सर सैयद स्वयं एक इतिहासकार और दुर्लभ पुरातत्ववेत्ता थे जिन्होंने जहागीर नामा और आर्इन-ए-अकबरी जैसी ऐतिहासिक पुस्तकों को संपादित किया।

इस अवसर पर शाहजहा विशेषज्ञ दिल्ली विश्वविधालय के प्रोफेसर मोहम्मद युनुस जाफरी ने डा आनन्द भटटाचार्य द्वारा लिखित पुस्तक सेपाय टू सूबेदार का भी विमोचन किया। उपसिथतजनों का आभार प्रोफेसर अली अथर ने जताया। इतिहास विभाग में शाहजहा शासन काल से संबंधित दुर्लभ सिक्कों, पुस्तकों आदि की प्रदर्शनी भी लगायी गयी है। दो दिन तक चलने वाले इस सेमीनार में देश के प्रमुख इतिहासकार भाग ले रहे हैं।
बार्इट :- डा.गुलफिशा खान (कनविनर)

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